लश्कर-ए-तैयबा के चीफ हाफिज सईद अचानक फिर से सुर्खियों में है. 10 मीलियन अमेरिकी डॉलर इनामी हाफिज सईद और उसके लश्कर पर लगी पाबंदी पिछले हफ्ते ही पाकिस्तान ने हटाई है. और अब चौंकाने वाली खबर ये आ रही है कि पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की मदद से हाफिज ने दो साल के अंदर पाकिस्तान में तख्ता पलट का पूरा ब्लू प्रिंट तैयार कर लिया है. इतना ही नहीं हाफिज ने अपने प्लान 20-20 के तहत जो प्लान बनाया है वो अगर कहीं कामयाब हो गया तो पाकिस्तान पूरी दुनिया के लिए खतरा बन जाएगा.
क्या पाकिस्तान में फिर तख्ता पलट होगा? क्या आतंक का आका पीएम बनने वाला है? 2020 में हाफिज़ सईद बनेगा पाकिस्तान का पीएम? ये सारे सवाल एक रिपोर्ट के बाद उठ रहे हैं. उस रिपोर्ट में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की तरफ से ये सनसनीखेज़ खुलासा किया गया है.
सिर्फ तीन महीने पुरानी बात है. पाकिस्तान के आम चुनाव में हाफिज़ सईद और आतंक के उसके लश्कर का खाता तक नहीं खुला था. ज़मानत तक ज़ब्त हो गई थी. एक तरह से पाकिस्तानी अवाम ने ही हाफिज़ और उशके लश्कर को पूरी तरह से नकार दिया था. मगर इस करारी और शर्मनाक हार के बावजूद हाफिज़ सईद ने एक ऐसे ब्लू प्रिंट तैयार किया है. जिसकी बदौलत वो सिर्फ दो साल में ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद को हथियाने जा रहा है. चौंकाने वाली बात ये है कि इस साज़िश का खुलासा कोई और नहीं बल्कि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट ने किया है.
सिर्फ हफ्ते भर पहले ही इमरान खान ने हाफिज़ और हाफिज़ के लश्कर पर लगे बैन को हटाया था. बाकायदा हाफिज़ सईद ने इस बारे में पाकिस्तान की अदालत को जानकारी भी दी. अब वही हाफिज़ सईद करारी चुनावी हार के बावजूद ट्वेंटी ट्वेंटी की साज़िश में जुट गया है.
हाफिज़ सईद के इस प्लान 20-20 का पूरा खुलासा करूं उससे पहले आपको बता दूं कि इंग्लैंड की जिस ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने ये चौकाने वाला खुलासा किया है. उसी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि इस वक्त सीरिया से भी ज़्यादा आतंकवादी पाकिस्तान की ज़मीं पर फल फूल रहे हैं. इतना ही नहीं इन आतंकवादियों की मौजूदगी की वजह से पाकिस्तान मानवता के लिए सीरिया से 3 गुना ज़्यादा खतरनाक है.
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की इस रिपोर्ट के मुताबिक दो साल बाद हाफिज़ सईद पाकिस्तान की सत्ता पर कब्ज़ा कर लेगा. और इसमें सिर्फ पाकिस्तानी सेना या उसके आतंकी संगठन नहीं बल्कि दुनिया के दूसरे मुल्क भी पीएम की कुर्सी तक पहुंचने के लिए उसकी सीढी बनेंगे.
तसव्वुर कीजिए एक इनामी आतंकी कल अगर पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनेगा तो क्या होगा. यकीनन ये कल्पना भी भारत को असहज करने वाली है. क्योंकि भारत जिसे मुल्क में आतंकी हमले का जिम्मेदार मानता है. और जिसके संगठन को आतंकी संगठन घोषित करने के लिए दुनियाभर में समर्थन हासिल कर रहा है. जब वही प्रधानमंत्री बन जाएगा. तो भारत की विदेश नीति का क्या होगा.
Thursday, December 6, 2018
Thursday, November 29, 2018
क्या हम मिलकर 'बलात्कार की संस्कृति' को सींच रहे हैं?
अब सवाल ये है कि क्या हम एक समाज के तौर पर बलात्कारयों के साथ खड़े हैं? क्या हम व्यक्तिगत तौर पर कहीं न कहीं बलात्कारियों से सहानुभूति रखते हैं? क्या हम बलात्कार का दोष किसी न किसी तरीके से पीड़िता पर डालने की कोशिश करते हैं?
इन सारे सवालों का जवाब है- हां.
'रेप कल्चर' यानी 'बलात्कार की संस्कृति' दुनिया के तक़रीबन हर हिस्से और हर समाज मेंकिसी न किसी रूप में मौजूद है.
बलात्कार की संस्कृति. रेप कल्चर.
ये शब्द सुनने में अजीब लगेंगे क्योंकि संस्कृति या कल्चर को आम तौर पर पवित्र और सकारात्मक संदर्भ में देखा जाता है. लेकिन संस्कृति या कल्चर सिर्फ़ ख़ूबसूरत, रंग-बिरंगी और अलग-अलग तरह की परंपराओं और रीति-रिवाजों का नाम नहीं है.
संस्कृति में वो मानसिकता और चलन भी शामिल है जो समाज के एक तबके को दबाने और दूसरे को आगे करने की कोशिश करते हैं. संस्कृति में बलात्कार की संस्कृति भी छिपी होती है जिसका सूक्ष्म रूप कई बार हमारी नज़रों से बचकर निकल जाता है और कई बार इसका भद्दा रूप खुलकर हमारे सामने आता है.
क्या है रेप कल्चर?
'रेप कल्चर' शब्द सबसे पहले साल 1975 में प्रयोग किया गया जब अमरीका में इसी नाम की एक फ़िल्म बनाई गई. 70 के दशक में अमरीका में महिलावादी आंदोलन ( (सेकेंड वेव फ़ेमिनिज़्म) ज़ोर पकड़ रहा था और इसी दौरान 'रेप कल्चर' शब्द चलन में आया.
'रेप कल्चर' का मतलब उस सामाजिक व्यवस्था से है जिसमें लोग बलात्कार का शिकार होने वाली महिला का साथ देने के बजाय किसी न किसी तरीके से बलात्कारी के समर्थन में खड़े हो जाते हैं.
'रेप कल्चर' का मतलब उस परंपरा से है जिसमें औरत को ही बलात्कार के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाता है.
'रेप कल्चर' उस संस्कृति का परिचायक है जिसमें बलात्कार और महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा को गंभीर अपराध के बजाय छोटी-मोटी और रोज़मर्रा की घटनाओं की तरह दिखाने की कोशिश की जाती है.
किसी समाज में या देश में 'रेप कल्चर' मौजूद है, ये साबित करना ज़्यादा मुश्किल नहीं है.
अगर भारत की बात करें तो ऊपरी तौर पर लग सकता है कि हम सब बलात्कार के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं, बलात्कारियों को सज़ा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं, औरतों के सम्मान और सुरक्षा के लिए लड़ रहे हैं...वगैरह-वगैरह.
इन बातों को पूरी तरह झुठलाया नहीं जा सकता लेकिन इनका दूसरा पक्ष भी है जो इनसे कहीं ज़्यादा मज़बूत है.
ये वो पक्ष है जो साबित करता है कि हम भी कहीं न कहीं बलात्कारियों के समर्थन में खड़े हैं और 'बलात्कार की संस्कृति' को सींचकर उसे ज़िदा रखने का अपराध कर रहे हैं.
इसका ताज़ा उदाहरण है कठुआ गैंगरेप मामला, जब अभियुक्तों के समर्थन में खुलेआम तिरंगा लहराया गया और नारे लगाए गए.
इन सारे सवालों का जवाब है- हां.
'रेप कल्चर' यानी 'बलात्कार की संस्कृति' दुनिया के तक़रीबन हर हिस्से और हर समाज मेंकिसी न किसी रूप में मौजूद है.
बलात्कार की संस्कृति. रेप कल्चर.
ये शब्द सुनने में अजीब लगेंगे क्योंकि संस्कृति या कल्चर को आम तौर पर पवित्र और सकारात्मक संदर्भ में देखा जाता है. लेकिन संस्कृति या कल्चर सिर्फ़ ख़ूबसूरत, रंग-बिरंगी और अलग-अलग तरह की परंपराओं और रीति-रिवाजों का नाम नहीं है.
संस्कृति में वो मानसिकता और चलन भी शामिल है जो समाज के एक तबके को दबाने और दूसरे को आगे करने की कोशिश करते हैं. संस्कृति में बलात्कार की संस्कृति भी छिपी होती है जिसका सूक्ष्म रूप कई बार हमारी नज़रों से बचकर निकल जाता है और कई बार इसका भद्दा रूप खुलकर हमारे सामने आता है.
क्या है रेप कल्चर?
'रेप कल्चर' शब्द सबसे पहले साल 1975 में प्रयोग किया गया जब अमरीका में इसी नाम की एक फ़िल्म बनाई गई. 70 के दशक में अमरीका में महिलावादी आंदोलन ( (सेकेंड वेव फ़ेमिनिज़्म) ज़ोर पकड़ रहा था और इसी दौरान 'रेप कल्चर' शब्द चलन में आया.
'रेप कल्चर' का मतलब उस सामाजिक व्यवस्था से है जिसमें लोग बलात्कार का शिकार होने वाली महिला का साथ देने के बजाय किसी न किसी तरीके से बलात्कारी के समर्थन में खड़े हो जाते हैं.
'रेप कल्चर' का मतलब उस परंपरा से है जिसमें औरत को ही बलात्कार के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाता है.
'रेप कल्चर' उस संस्कृति का परिचायक है जिसमें बलात्कार और महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा को गंभीर अपराध के बजाय छोटी-मोटी और रोज़मर्रा की घटनाओं की तरह दिखाने की कोशिश की जाती है.
किसी समाज में या देश में 'रेप कल्चर' मौजूद है, ये साबित करना ज़्यादा मुश्किल नहीं है.
अगर भारत की बात करें तो ऊपरी तौर पर लग सकता है कि हम सब बलात्कार के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं, बलात्कारियों को सज़ा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं, औरतों के सम्मान और सुरक्षा के लिए लड़ रहे हैं...वगैरह-वगैरह.
इन बातों को पूरी तरह झुठलाया नहीं जा सकता लेकिन इनका दूसरा पक्ष भी है जो इनसे कहीं ज़्यादा मज़बूत है.
ये वो पक्ष है जो साबित करता है कि हम भी कहीं न कहीं बलात्कारियों के समर्थन में खड़े हैं और 'बलात्कार की संस्कृति' को सींचकर उसे ज़िदा रखने का अपराध कर रहे हैं.
इसका ताज़ा उदाहरण है कठुआ गैंगरेप मामला, जब अभियुक्तों के समर्थन में खुलेआम तिरंगा लहराया गया और नारे लगाए गए.
Wednesday, November 7, 2018
英国维护司机安全做法可借鉴
重庆万州公交车坠江惨案引发中国社会反思。英国公共交通的安全制度或许可以借鉴。
英国的公交车系统上不良乘客攻击司机的事件并非没有,而是不少,但以“彬彬有礼绅士风度”闻名的英国人是如何处理的呢?
英国的司机也可能会对乘客的骚扰或攻击“报以老拳”,这种情况如何处理,请看此文下面的例子。
2018年11月初的重庆万州公交车坠江事故原因,由车上和桥上的闭路摄像揭示:因为一名女乘客因为坐过了站,找司机争执要求停车,继而在两人发生口头争论之际,女乘客动手攻击司机,司机还手,随即公交汽车失控。
在冲过逆行车道撞上对过行驶的一辆轿车后,这辆公交汽车冲出大桥护栏坠入江中,导致车上13人全部死亡。
事件发生后,中国民众对此议论纷纷,社交媒体刷屏,很多评论批评司机,批评挑起事端的女乘客,还有批评车上沉默的十多名乘客。
伦敦的桥也很多,如何保证类似事件发生,英国人早有各种制度、工具和行为规范来约束公交车上各方责任和义务。
英国公交司机的冲突应对培训
在英国,导致公共汽车危险的事件并非没有,多数情况下是乘客攻击司机,偶尔也会发生司机反击乘客的打斗事件。
2014年公布的一项统计数据显示,伦敦之前3年发生近5000起公交乘客攻击司机事件,从口头骂人侮辱,吐吐沫,到有肢体攻击行为。38%的攻击涉及动手打人或挥舞武器威胁。
从2005年开始,伦敦市政府展开对公交车司机的安全培训,除了开车技能外,重点还包括“如何应对冲突”,公交部门与警方建立密切联系。
与此同时,从乘客角度增加到站、提示安全等等语音播报,从安全角度不再允许乘客跳上跳下公共汽车。
此外在公交车安全的硬件上予以更多投入,包括使用司机可以与乘客隔离的驾驶空间的公交车,普及公交车上的监控录像,司机与调度随时联系的应答系统等,方便司机在遇到各种包括有人攻击的情况下,及时与汽车调动与交通警察联系
英国的公交车系统上不良乘客攻击司机的事件并非没有,而是不少,但以“彬彬有礼绅士风度”闻名的英国人是如何处理的呢?
英国的司机也可能会对乘客的骚扰或攻击“报以老拳”,这种情况如何处理,请看此文下面的例子。
2018年11月初的重庆万州公交车坠江事故原因,由车上和桥上的闭路摄像揭示:因为一名女乘客因为坐过了站,找司机争执要求停车,继而在两人发生口头争论之际,女乘客动手攻击司机,司机还手,随即公交汽车失控。
在冲过逆行车道撞上对过行驶的一辆轿车后,这辆公交汽车冲出大桥护栏坠入江中,导致车上13人全部死亡。
事件发生后,中国民众对此议论纷纷,社交媒体刷屏,很多评论批评司机,批评挑起事端的女乘客,还有批评车上沉默的十多名乘客。
伦敦的桥也很多,如何保证类似事件发生,英国人早有各种制度、工具和行为规范来约束公交车上各方责任和义务。
英国公交司机的冲突应对培训
在英国,导致公共汽车危险的事件并非没有,多数情况下是乘客攻击司机,偶尔也会发生司机反击乘客的打斗事件。
2014年公布的一项统计数据显示,伦敦之前3年发生近5000起公交乘客攻击司机事件,从口头骂人侮辱,吐吐沫,到有肢体攻击行为。38%的攻击涉及动手打人或挥舞武器威胁。
从2005年开始,伦敦市政府展开对公交车司机的安全培训,除了开车技能外,重点还包括“如何应对冲突”,公交部门与警方建立密切联系。
与此同时,从乘客角度增加到站、提示安全等等语音播报,从安全角度不再允许乘客跳上跳下公共汽车。
此外在公交车安全的硬件上予以更多投入,包括使用司机可以与乘客隔离的驾驶空间的公交车,普及公交车上的监控录像,司机与调度随时联系的应答系统等,方便司机在遇到各种包括有人攻击的情况下,及时与汽车调动与交通警察联系
Tuesday, October 30, 2018
बिहार में बीजेपी का अंदाज बुलंद की जगह मंद क्यों है?
ह जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के साथ सीटों की उम्मीदवारी में बराबर की हिस्सेदारी क़बूल कर चुकी है.
ज़ाहिर है कि इस कारण बिहार में बीजेपी के हौसले बुलंद नहीं, मंद नज़र आ रहे हैं.
याद रहे कि पिछले लोकसभा चुनाव में जेडीयू मात्र दो सीटों पर जीत पायी थी.
उधर बीजेपी को अन्य दो छोटे सहयोगी दलों - रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के लिए भी कम-से-कम उनकी जीती हुई सीटें छोड़नी है.
शाह का बिहारी गणित?
इसी संदर्भ में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से उपेंद्र कुशवाहा की आज मुलाक़ात होने वाली है.
फिर जल्दी ही रामविलास पासवान को भी अमित शाह बातचीत के लिए बुला सकते हैं.
नडीए के घटक - एलजेपी और रालोसपा को ये अच्छा नहीं लगा कि बीजेपी ने जेडीयू से पहले ही फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी वाला समझौता कर लिया.
लेकिन मुख्य सवाल ये है कि पिछले लोकसभा चुनाव में बिहार की कुल 40 सीटों में से 30 पर चुनाव लड़ कर 22 सीटें जीत लेने वाली बीजेपी इस बार मात्र 16 या 17 पर ही चुनाव लड़ने को मजबूर क्यों हुई?
कारण कई हो सकते हैं. लेकिन जो मुख्य वजह सतह पर दिखती है, वह है बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और कांग्रेस गठबंधन की तरफ़ से संभावित बड़ी चुनौती.
फेल होती रणनीति
लालू यादव से जुड़ी जमात में सेंध लगाने के लिए बीजेपी द्वारा नियुक्त यादव नेताओं का बेअसर हो जाना सबने देखा है.
अक्सर यहाँ चुनावों में जातीय आधार इतना प्रबल हो जाता है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की संभावना उभर नहीं पाती है. प्रयास ज़रूर होते हैं.
अयोध्या के राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट से त्वरित सुनवाई और लोकसभा चुनाव से पहले फ़ैसले की जो उम्मीद बीजेपी ने की थी, वह अब पूरी होती नही लगती.
ऐसे में अगर जेडीयू, एलजेपी और रालोसपा बीजेपी के साथ न रहे, मतलब राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) यहाँ बिखर जाए, तो परिणाम का सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
ख़ासकर तब, जब बीजेपी राष्ट्रीय स्तर पर एक नहीं अनेक कारणों से मुश्किलों में फँसी हुई दिख रही हो.
रफ़ाल का भूत
मसलन कालेधन/नोटबंदी की किरकिरी, डीज़ल-पेट्रोल की मारक मूल्यवृद्धि, बैंकों का महाघपला, रफ़ाल डील पर सवाल और सीबीआई पर थू-थू समेत कई मसलों पर भारी फ़ज़ीहत हो रही है.
साथ ही लोकसभा चुनाव के समय नरेंद्र मोदी से बड़ी-बड़ी उम्मीदें बाँध कर उनके समर्थन में उमड़े जनसामान्य का अब तेज़ी से मोहभंग हो रहा है.
दलितों का समर्थन हासिल करने के प्रयास में सवर्णों की नाराज़गी झेलने जैसी मुश्किल इसी समय आ पड़ी है.
इधर बिहार में कथित डबल इंजन वाली राज्य सरकार की छवि प्रगति की तेज़ रफ़्तार लाने वाली सरकार जैसी नहीं बन पायी है.
यहाँ तो सरकारी संरक्षण में चल रहे बालिका गृह बलात्कार कांड समेत अपराध और भ्रष्टाचार की बढ़ती घटनाओं ने राज्य सरकार की छवि और बिगाड़ दी है.
इतना ही नहीं, ' बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो ' वाला पिछला चुनावी नारा अब एक मज़ाक बन कर रह गया है.
ज़ीरो टॉलरेंस से हीरो टॉलरेंस
ऐसे नारे और जुमले गढ़ने वाले फ़्रीलांस सियासी रणनीतिकार प्रशांत किशोर अब नीतीश कुमार के दलबद्ध सलाहकार बन गए हैं.
इन्हें पता होगा कि तेरह साल से बिहार में बरक़रार सरकारी मुखिया के शासनकाल में भी विकास इसलिए फ़ेल होता रहा, क्योंकि विकास के नाम पर पल रहे लूटतंत्र पर कभी कारगर चोट नहीं की गयी.
भ्रष्टाचार, ख़ासकर तरह-तरह के घोटाले, रिश्वत/कमीशनखोरी और ट्रांसफ़र-पोस्टिंग से वसूली में तो नीतीश राज को ' ज़ीरो टॉलरेंस ' नहीं, 'हीरो टॉलरेंस' वाले शासन के रूप में याद किया जाएगा.
इसलिए ' फिर से नीतीशे ' की तर्ज पर आगामी लोकसभा चुनाव में ' फिर से मोदी ' का नारा हिट होने के बजाय पिट जाने की आशंका से ग्रस्त दिखने लगा है.
वैसे, अपने दल और अपनी सत्ता की लचर स्थिति को सुधारने में नीतीश कुमार पिछले कुछ समय से अधिक सक्रिय लगने लगे हैं.
बीजेपी पर दबाव बढ़ा कर जेडीयू के हक़ में चुनावी समझौते को मोड़ देना, लगातार सांगठनिक बैठकें आयोजित करना और प्रशांत किशोर को अपने साथ जोड़ कर चुनावी रणनीति बनाने में जुट जाना उसी सक्रियता के कुछ नमूने है.
जेडीयू इस कोशिश में है कि वह बिहार में बीजेपी की जूनियर पार्टनर बन कर उस के पीछे-पीछे चलने जैसी भूमिका में बिलकुल न दिखे.
यानी एक समय नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ बेहद गरम रुख़ अपना कर, कुछ ही समय बाद नरम पड़ जाने वाले नीतीश कुमार अभी भी ग़ैरभाजपाई जमात में शामिल हो पाने जैसी गुंजाइश बचा कर रखना चाहते हैं?
जेडीयू ने दबाव बनाया था कि आगामी लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार को 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए का मुख्यमंत्री-प्रत्याशी घोषित किया जाए. लेकिन बीजेपी राज़ी नहीं हुई.
लगता है जेडीयू की यह चुभन फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी वाले चुनावी समझौते से थोड़ी कम ज़रूर हुई होगी.
जो भी हो, सियासी टीकाकार तो यही मानते हैं कि नीतीश कुमार, रामविलास पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा का एनडीए में बने रहना इन तीनों की स्वार्थजनित विवशता है.
अब आगे दोनों दलों में सीटों के आवंटन पर खींचतान, उम्मीदवारों के चयन में उठापटक और टिकट से वंचित प्रत्याशियों के हंगामे क्या-क्या रंग दिखाएँगे, अभी कहना मुश्किल है.
ज़ाहिर है कि इस कारण बिहार में बीजेपी के हौसले बुलंद नहीं, मंद नज़र आ रहे हैं.
याद रहे कि पिछले लोकसभा चुनाव में जेडीयू मात्र दो सीटों पर जीत पायी थी.
उधर बीजेपी को अन्य दो छोटे सहयोगी दलों - रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के लिए भी कम-से-कम उनकी जीती हुई सीटें छोड़नी है.
शाह का बिहारी गणित?
इसी संदर्भ में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से उपेंद्र कुशवाहा की आज मुलाक़ात होने वाली है.
फिर जल्दी ही रामविलास पासवान को भी अमित शाह बातचीत के लिए बुला सकते हैं.
नडीए के घटक - एलजेपी और रालोसपा को ये अच्छा नहीं लगा कि बीजेपी ने जेडीयू से पहले ही फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी वाला समझौता कर लिया.
लेकिन मुख्य सवाल ये है कि पिछले लोकसभा चुनाव में बिहार की कुल 40 सीटों में से 30 पर चुनाव लड़ कर 22 सीटें जीत लेने वाली बीजेपी इस बार मात्र 16 या 17 पर ही चुनाव लड़ने को मजबूर क्यों हुई?
कारण कई हो सकते हैं. लेकिन जो मुख्य वजह सतह पर दिखती है, वह है बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और कांग्रेस गठबंधन की तरफ़ से संभावित बड़ी चुनौती.
फेल होती रणनीति
लालू यादव से जुड़ी जमात में सेंध लगाने के लिए बीजेपी द्वारा नियुक्त यादव नेताओं का बेअसर हो जाना सबने देखा है.
अक्सर यहाँ चुनावों में जातीय आधार इतना प्रबल हो जाता है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की संभावना उभर नहीं पाती है. प्रयास ज़रूर होते हैं.
अयोध्या के राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट से त्वरित सुनवाई और लोकसभा चुनाव से पहले फ़ैसले की जो उम्मीद बीजेपी ने की थी, वह अब पूरी होती नही लगती.
ऐसे में अगर जेडीयू, एलजेपी और रालोसपा बीजेपी के साथ न रहे, मतलब राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) यहाँ बिखर जाए, तो परिणाम का सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
ख़ासकर तब, जब बीजेपी राष्ट्रीय स्तर पर एक नहीं अनेक कारणों से मुश्किलों में फँसी हुई दिख रही हो.
रफ़ाल का भूत
मसलन कालेधन/नोटबंदी की किरकिरी, डीज़ल-पेट्रोल की मारक मूल्यवृद्धि, बैंकों का महाघपला, रफ़ाल डील पर सवाल और सीबीआई पर थू-थू समेत कई मसलों पर भारी फ़ज़ीहत हो रही है.
साथ ही लोकसभा चुनाव के समय नरेंद्र मोदी से बड़ी-बड़ी उम्मीदें बाँध कर उनके समर्थन में उमड़े जनसामान्य का अब तेज़ी से मोहभंग हो रहा है.
दलितों का समर्थन हासिल करने के प्रयास में सवर्णों की नाराज़गी झेलने जैसी मुश्किल इसी समय आ पड़ी है.
इधर बिहार में कथित डबल इंजन वाली राज्य सरकार की छवि प्रगति की तेज़ रफ़्तार लाने वाली सरकार जैसी नहीं बन पायी है.
यहाँ तो सरकारी संरक्षण में चल रहे बालिका गृह बलात्कार कांड समेत अपराध और भ्रष्टाचार की बढ़ती घटनाओं ने राज्य सरकार की छवि और बिगाड़ दी है.
इतना ही नहीं, ' बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो ' वाला पिछला चुनावी नारा अब एक मज़ाक बन कर रह गया है.
ज़ीरो टॉलरेंस से हीरो टॉलरेंस
ऐसे नारे और जुमले गढ़ने वाले फ़्रीलांस सियासी रणनीतिकार प्रशांत किशोर अब नीतीश कुमार के दलबद्ध सलाहकार बन गए हैं.
इन्हें पता होगा कि तेरह साल से बिहार में बरक़रार सरकारी मुखिया के शासनकाल में भी विकास इसलिए फ़ेल होता रहा, क्योंकि विकास के नाम पर पल रहे लूटतंत्र पर कभी कारगर चोट नहीं की गयी.
भ्रष्टाचार, ख़ासकर तरह-तरह के घोटाले, रिश्वत/कमीशनखोरी और ट्रांसफ़र-पोस्टिंग से वसूली में तो नीतीश राज को ' ज़ीरो टॉलरेंस ' नहीं, 'हीरो टॉलरेंस' वाले शासन के रूप में याद किया जाएगा.
इसलिए ' फिर से नीतीशे ' की तर्ज पर आगामी लोकसभा चुनाव में ' फिर से मोदी ' का नारा हिट होने के बजाय पिट जाने की आशंका से ग्रस्त दिखने लगा है.
वैसे, अपने दल और अपनी सत्ता की लचर स्थिति को सुधारने में नीतीश कुमार पिछले कुछ समय से अधिक सक्रिय लगने लगे हैं.
बीजेपी पर दबाव बढ़ा कर जेडीयू के हक़ में चुनावी समझौते को मोड़ देना, लगातार सांगठनिक बैठकें आयोजित करना और प्रशांत किशोर को अपने साथ जोड़ कर चुनावी रणनीति बनाने में जुट जाना उसी सक्रियता के कुछ नमूने है.
जेडीयू इस कोशिश में है कि वह बिहार में बीजेपी की जूनियर पार्टनर बन कर उस के पीछे-पीछे चलने जैसी भूमिका में बिलकुल न दिखे.
यानी एक समय नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ बेहद गरम रुख़ अपना कर, कुछ ही समय बाद नरम पड़ जाने वाले नीतीश कुमार अभी भी ग़ैरभाजपाई जमात में शामिल हो पाने जैसी गुंजाइश बचा कर रखना चाहते हैं?
जेडीयू ने दबाव बनाया था कि आगामी लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार को 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए का मुख्यमंत्री-प्रत्याशी घोषित किया जाए. लेकिन बीजेपी राज़ी नहीं हुई.
लगता है जेडीयू की यह चुभन फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी वाले चुनावी समझौते से थोड़ी कम ज़रूर हुई होगी.
जो भी हो, सियासी टीकाकार तो यही मानते हैं कि नीतीश कुमार, रामविलास पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा का एनडीए में बने रहना इन तीनों की स्वार्थजनित विवशता है.
अब आगे दोनों दलों में सीटों के आवंटन पर खींचतान, उम्मीदवारों के चयन में उठापटक और टिकट से वंचित प्रत्याशियों के हंगामे क्या-क्या रंग दिखाएँगे, अभी कहना मुश्किल है.
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